गीताद्वारकी रचनाके प्रत्येक पादमें भारतीय संस्कृति, धर्म एवं कलाकी गरिमाको सन्निहित करनेका प्रयास है । इस मुख्यद्वारके निर्माणमें देशकी गौरवमयी प्राचीन कलाओं तथा विख्यात प्राचीन मन्दिरोंसे प्रेरणा ली गयी है और इनकी विभिन्न शैलियोंका आंशिकरूपमें दिग्दर्शन करानेका प्रयास किया गया है ।

उदाहरणार्थ – मुख्यद्वारके खम्भे दक्षिण भारतके सुप्रसिद्ध गुफा-मन्दिर एलोराके खम्भोंकी अनुकृतिपर और मध्य-भवनमें,श्रीकृष्णार्जुनके संगमरमरके रथके पीछे बना मण्डलाकार आयत प्रसिद्ध गुफा-मन्दिर-अजन्ताके मुख-भागके आधारपर निर्मित है । ऐसे ही शिखर-भाग दक्षिण भारतके प्रसिद्ध मीनाक्षी-मन्दिरके शीर्षभागका स्मरण दिलाता है ।

इस भव्य एवं प्रतीकात्मक गीताद्वारका उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ० श्रीराजेन्द्रप्रसादजीने अपने कर-कमलों द्वारा 29 अप्रैल 1955 को किया था ।